Jharkhand Ke Mahapurush Ke Naam / झारखंड के प्रमुख लोग

झारखण्ड के प्रमुख महापुरुष / Jharkhand ke Mahapurush ke Naam

यहाँ उन सभी प्रमुख व्यक्तियो के बारे में बताया गया है जिन्होंने झारखण्ड में अंग्रेजों के विरूद्ध अपना बहुत बड़ा योग्यता दिया । इस सभी व्यक्तियो के बारे में से अक्सर झारखण्ड के एग्जाम में क्वेश्चन पूछे जाते है जिनको आपको जानना बहुत ही जरुरी है।
Jharkhand Ke Mahapurush Ke Naam / झारखंड के प्रमुख लोग
Jharkhand Ke Mahapurush Ke Naam / झारखंड के प्रमुख लोग

 

बिरसा मुंडा / Birsa Munda

बिरसा मुण्डा का जन्म 15 नवम्बर 1875 ई. को रांची जिले के खूंटी अनुमण्डल के उलिहातू नामक गाँव में एक गरीब परिवार में हुआ था ।
प्रारंभिक शिक्षा जर्मन एवेंजेलिकल चर्च के द्वारा स्थापित विद्यालय से पूरी की, छात्र जीवन मे ही चाईबासा में चल रहे भूमि आंदोलन से भी जुड़ गए । और बाद में 18 वर्ष की आयु में वे चक्रधरपुर के जंगल आंदोलन में भी शामिल हुए। इन्होने 1894 ई में अंग्रेजो के खिलीफ़ मुण्डा आदिवासियों का नेतृत्व किया था।
1895 ई  में इन्होंने अपने आपको सिंगबोंगा का दूत (पैग़म्बर के समतुल्य) बताया और एक नए पथ की शुरुआत की । 1895 के अन्त में इन्हें ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध षडयंत्र रचने के आरोप में 2 साल के लिए जेल में डाल दिया गया । कुछ समय बाद 1897 में उन्हें हजारीबाग जेल से रिहा कर दिया गया , जिसके बाद वे पुनः भूमि आंदोलन में सक्रिय हो गए ।
फरवरी 1900 ई. में उन्हें दुबारा बंदी बना लिया गया और 9 जून 1990 ई को रांची जेल में बिरसा मुंडा का रहस्य्मयी तरीके से निधन हो गया अंग्रेज सरकार ने इनकी मौत का कारण हैजा बीमारी बताया जबकि उनमें हैजा के कोई लक्षण नहीं थे। आदिवासी लोग इन्हे भगवान बिरसा कहते है।
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सिद्धू कानू / Sidhu Kanhu

सिद्धू कानू का जन्म भगनीडीह में हुआ था। वर्ष 1855-1856 में हुए संथाल विद्रोह का नेतृत्व चार मुर्मू भाइयों – सिद्धू (जन्म :1815 ई.) , कानू ( जन्म :1820 ई.) , चाँद (जन्म :1825 ई.) और भैरव (जन्म :1835 ई. ) ने किया था । यह विद्रोह मुख्य रूप से अंग्रेज सरकार, जमीनदार और साहूकार के खिलाफ था ।
30 जून 1855 भगनीडीह की एक सभा मे लगभग 6000 संथाल व्यक्ति आये और उन्होंने एक साथ विद्रोह (हुल) करने का निर्णय लिया। इस सभा मे लोगो ने सिद्धू को राजा और कानू को मंत्री चुना । सिद्धू ने सबका नेतृत्व करते हुए नारा लगाया ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’ । जल्द ही विद्रोह भागलपुर से फैल कर आस पास के क्षेत्रो तक बहुत तेजी से फैलने लगा । अंग्रेजों ने यह देख कर संथालों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की । चाँद और भैरव गोली के शिकार हुए । और सिद्धू कानू को पकड़ कर उन्हें फांसी दी गयी ।

जतरा भगत / Jatra Bhagat

टाना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म 2 अक्टूबर 1888 ई. को गुमला जिले के विशुनपुर प्रखंड के चिंगरी नावाटोली गाव के उराँव परिवार में हुआ था । जतरा भगत के पिता का नाम कोहरा भगत और माता का नाम लिबरी भगत था । 1914 ई. में टाना भगत आंदोलन का शरुवात किया । यह एक प्रकार का संस्कृतीकरण आंदोलन था ।  और वे बहुत जोर-शोर से आंदोलन करने लगें थे । 1916 ई. में जतरा भगत को एक वर्ष की सजा दी गयी । और उन्हें बाद में यह कह कर छोड़ा गया कि वे अब आंदोलन , प्रचार नही करेंगे और शांति बनायें रखेंगे । किन्तु जेल में मिली बहुत यातनाएं और पीड़ा के चलते जेल से बाहर आने के दो महीने के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गयी ।

तिलका मांझी / Tilka Manjhi

तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 ई. को सुल्तानगंज थाना के तिलकपुर गांव के एक संथाल परिवार में हुआ था । तिलका मांझी का वास्तविक नाम जबरा पहाड़िया था । तिलका मांझी नाम तो उन्हें अंग्रेज सरकार ने प्रदान किया था । तिलका ने भागलपुर के पास वनचरीजोर नामक स्थान से अंग्रेजों का विद्रोह करना शुरू कर दिया । उसने साल पत्ते के माध्यम से गाँव के हर घर मे संदेश भेजना शुरू किया और और संथालो को एकत्रित करना शुरू किया । वर्ष 1784 ई. के शुरू होने से पहले ही अपने अनुयायियों के साथ मिल कर तिलका ने भागलपुर में आक्रमण कर दिया । लगभग इसी समय 13 जनवरी के दिन वह एक ताड़ के पेड़ पर बैठ कर उसी रास्ते से घोड़ा से आ रहे एक अंग्रेज अधिकारी को मार गिराया । जिसके बाद आयरकूट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने तिलका के अनुयायियों पर आक्रमण कर दिया । जिसमें वहाँ से तिलका मांझी भाग निकला और सुल्तानगंज की पहाड़ियों में जा कर छिप गया । 1785 ई. में उनको धोखे से पकड़ लिया गया और रस्सी में बांध कर घोड़ों द्वारा घसीटते हुए उन्हें भागलपुर लाया गया, जहाँ उन्हें बरगद के पेड़ में लटका कर फाँसी दे दी गयी । वह स्थान अब ‘बाबा तिलका माँझी चौक’ के नाम से जाना जाता है । मांझी अंग्रेजों के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने वाले पहले आदिवासी थे इसलिए उन्हें ‘आदि विद्रोही’ भी कहाँ जाता है ।
Jharkhand Ke Mahapurush Ke Naam
 

बुधु भगत / Bhudu Bhagat

बुधु भगत का जन्म राँची जिला के चान्हो प्रखंड में सिलगाई नामक गाँव मे एक उराँव परिवार में 17 फरवरी 1792 ई. में हुआ था । बुधु भगत 1831-1832 ई. में हुए कोल विद्रोह के एक प्रमुख नेता थे । इन्होंने अंग्रेजों और उनके भारतीय एजेंटों के खिलाफ अपना विद्रोह शुरू किया । वे एक बहुत ही उत्तमः कोटि के नेता थे जिन्होंने आदिवासी समाज मे अपना बहुत ही अच्छा पहचान बना लिया था ये देख कर अंग्रेजों ने उनके ऊपर 1000 रुपये का इनाम रख दिया था । इतना बड़ा इनाम रखने के बाद भी आदिवासी ने अंग्रेजों की कोई मदद नही की । और सभी आदिवासी एकजुट हो के बुधु भगत का पूरा सहयोग देते रहे । ये देख कर अंग्रेजों ने अपनी कार्यवाही और भी तेज कर दी जिसके परिणाम स्वरूप 14 फरवरी 1832 ई. को बुधु बगत , उसके भाई, बेटे, भतीजे और 150 अनुयायियों के साथ उन्हें कैप्टन इम्पे के नेतृत्व में अंग्रेजी बन्दूक सैनिकों के हाँथो मारे गए ।

गंगा नारायण सिंह / Ganga Narayan Singh

गंगा नारायण सिंह का जन्म बड़ाभूम (वीरभूम) में एक राज परिवार में हुआ था । इन्होंने 1832 में मानभूम में हुए भूमिज विद्रोह का नेतृत्व किया था । यह विद्रोह वीरभूम राजा एवं उसके दीवान, पुलिस अधिकारियों, मुंसिफ, नमक दारोगा तथा  अन्य मतलबी जमींदारों से था । इस विरोध के परिणाम स्वरुप 7 फरवरी 1833 ई. में गंगा नारायण सिंह को खरसवाँ के ठाकुर चेतन सिंह ने सैनिकों के हाँथो मारे गए ।

 भागीरथ मांझी / Bhagirath Manjhi 

भागीरथ मांझी का जन्म गोड्डा जिले के तलडीहा गांव में हुआ था । वे खरवार जनजाति के थे । उन्होंने 1874 ई. में एक आन्दोलन की शुरुआत की जिसे खरवार आंदोलन कहाँ जाता है । उन्होंने बताया कि उनको सिंगबोंगा का दर्शन हुआ है और सिंगबोंगा ने उन्हें बौसी गांव का राजा नियुक्त किया है । इसलिए उन्होंने खुद को राजा घोषित किया और ब्रिटिश सरकार और जमींदार को कर ना देने की घोषणा की । उन्होंने लोगो पर लगान तय कर दिए और उनको उसका रसीद दिए और लगान की वसूली शुरू कर दी । उनकी ये हरकत के कारण उनको गिरफ्तार कर लिया गया । 1877 ई. में उन्हें रिहा कर दिया गया । और उसके दो साल बाद ही 1879 ई. में उनको मृत्यु हो गयी ।
Jharkhand Ke Mahapurush Ke Naam
आशा करता हु की आपको यहाँ दी गयी जानकरी समझ में आए होगी यहाँ मेने आपको बहुत ही आसान शब्दो में समझने की कोशिश की है जिससे आप जल्द से जल्द और लम्बे समय तक बहुत ही आसानी से याद रख सके। 

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